Wednesday, November 24, 2010

नयी, पुरानी टिहरी


मनोत्री आज सुबह से कुछ अनमनी सी थी | सर्दियों की धूप वैसे भी मन को अन्यत्र कहीं ले जाती है | इतवार का दिन सारे लोग घर पर ही थे, छत पर धूप सेंकने के लिए | जेठ जेठानी, उनके बेटे-बहुएँ, पोता  प्रतीक भी अपनी छत पर घाम ताप रहे थे | ऐसा नहीं कि अलग छत पे हों, दोनों छत मिली हुई थी | लेकिन मनोमालिन्य ने दूरियों को एक छत से ज्यादा बढ़ा दिया था | सुधीर छुटियाँ लेकर आया था, बहू भी साथ आई थी, अमेरिका से | अमेरिका बोलने में जमनोत्री को मे पर काफी जोर डालना पड़ता था | सुधीर के पापा तो सुबह ही उठकर भजन गाने लगते हैं, अभी भी इस आदत को नहीं छोड़ा | 
"बस भी करो, थोड़ा धीमे बोलो या चुपचाप सो जाओ, बच्चे सो रहे हैं |" जमनोत्री ने उलाहना दिया| सुधीर के पापा गाते रहे "इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकलें..." हारकर जमनोत्री को उठना पड़ा | 

बहू अमेरिका से साड़ी लेकर आई थी | "नहीं मम्मी जी, इसे पहनो... देखो, आप पर कितनी अच्छी लग रही है |" 
जमनोत्री हतप्रभ थी- "उस देश में साड़ी मिलती है क्या ? साड़ी पहनती है तू वहां ?" 
सुधीर नाश्ता करते हुए बोला - "अरे माँ, इसके पास तो इतनी साड़ी हैं कि उनके लिए एक कमरा खाली करना पड़ा हमें वहां |" 
"अच्छा !!!" जमनोत्री ने बनावटी आश्चर्य प्रकट किया | 
"और आप मेरी दी हुई साड़ी पहनती भी नहीं" बहू की नाराजगी जायज़ थी | 
"अरे बेटा, यहाँ कहाँ पहनूं मैं अब ? कभी कभी शादियों पार्टियों में पहन लेती हूँ |"  जमनोत्री बचाव कर रही थी, बहू को दुःख नहीं पहुँचना चाहिए | 
"क्या बात कर रही हो मम्मी जी! अरे वो तो मैं घर में पहनने के लिए लायी थी, आप उन्हें घर पे पहना कीजिये , शादियों में नहीं |" बहू कहीं से भी उनका उपहास नहीं कर रही थी | यहाँ भी हारकर जमनोत्री को बहू की लायी गयी साड़ी पहनकर बैठना पड़ा | 

जेठानी समझदार थी, बाहर से ही घर में चल रहा वातावरण समझ गयीं | "अरे बहू! क्या बात है, क्यूँ  डांट रही हो इसे ?" जमनोत्री की जेठानी ने हल्के माहौल को और हल्का करने की कोशिश की |
"नहीं नहीं मम्मी जी, डांट नहीं रही हूँ, मैं मम्मी जी को कह रही थी कि....और आप भी मेरी दी हुई साड़ी नहीं पहनती |" बहू अब जेठानी से सवाल जवाब करने लगीं | 
"नहीं बेटा, पहनती हूँ..." जेठानी जी भी सकपका गयीं "मैंने अभी स्नान-ध्यान कुछ नहीं किया, उसके बाद पहनूंगी |" 
"आज बहू सबकी तलाशी लेगी |" जमनोत्री को अपनी बहू पर लाड़ आ गया | कभी कभी बच्चों जैसी जिद पे उतर आती है, सुधीर की दादी तो अभी तक हमपे इतने ताने मार चुकी होती कि...खैर जमाना बदल गया है, तो हमें भी बदलना चाहिए "अरे बहू! अब बुढापे में हम लोगों का भी क्या पहनना ओढ़ना | पूरा बचपन और जवानी जंगल में काट दी | घर से निकले मुँह-अँधेरे और जंगल गए घास-पात, कभी लकड़ी लेने, खेतों में काम, बैलों को सानी, दिन भर में इतने काम होते कि किसे याद कि फैशन  भी करना है | हाँ , कभी किसी की शादी-ब्याह के वक़्त देख लिया ऐना तो ठीक, नहीं तो ऐसे ही चल दिए |" 
बहू के मुँह से बेसाख्ता निकल गया -"हाँ तो अब थोड़े ही जंगल में हो |"


प्रतीक भी अब इस ओर नहीं आता, जाने उसकी दादी ने क्या कहा उससे कि अब सिर्फ अपनी छत पे ही खेलता रहता है | जमनोत्री ने नन्हे प्रतीक को अपनी गाडी को उलट पलटकर ठीक करते हुए देखा | पिछली छुट्टी में सुधीर लेके आया था प्रतीक के लिए, अमेरिका से | "ए प्रतीक! इधर आ!" जमनोत्री ने पुकारा | प्रतीक ने सर उठाकर देखा, और फिर सर झुका लिया "देख नहीं रहे, मैं अभी बिजी हूँ|" प्रतीक भी बिजी था, प्रतीक की दादी ने स्नान-ध्यान करके बहू की दी हुई साड़ी पहनी थी | इधर सुधीर के पापा धूप में चटाई बिछा के लेट गए और अखबार पढ़ने लगे | अभी थोड़ी देर में अखबार पढ़ते पढ़ते ही सो जायेंगे | सुधीर इस बीच छत पे आ गया, अपने मोबाइल पे गाने बजाने लगा | जरूर सुधीर ने बहू के साथ कुछ चुहल की होगी, तभी भागते भागते छत पे आया है | जमनोत्री का अनुमान बिलकुल सही था, बहू भी पीछे पीछे छत पे आई, और आँखों ही आँखों में सुधीर से गुस्सा भी थी |


रास्ते में लगे हुए पेड़ों की शाखाएं बिजली के तारों को छूने लगे थे | एक निश्चित समय अंतराल पर उनकी शाखाएं काटने के लिए बिजली विभाग किसी को भेजता था | खट-खट की आवाज आने लगी, और एक शाख काट दी गयी | शाख के गिरते ही छत की आखिरी छोरों पे खड़ी जमनोत्री और उसकी जेठानी की आँखों आखों में ही कुछ बातें हुई | फ़ौरन से दोनों उठ गयी | मंहंगी अमेरिकन साड़ी के आँचल को कमर में बाँधा, और दोनों चल पड़ी टूटी हुई शाखें उठाने के लिए | "मम्मी जी कहाँ जा रही हैं ?" बहू ने सुधीर से पूछा | सुधीर का ध्यान रास्ते पे गया, जहाँ जमनोत्री टूटी हुई डाल को कंधे पे उठा के विजयी मुद्रा में चली आ रही थी | उनके पीछे ही जेठानी भी दूसरी डाल लेकर आ रही थी | "माँ! क्या कर रही हो उनका ?" सुधीर ने जिज्ञासा प्रकट की | जमनोत्री का ध्यान सुधीर की बातों पे नहीं था, जेठानी एक डाल अपनी छत पे रखके दूसरी लेने के लिए जल्दी कर रही थी | जमनोत्री ने जल्दी से डाल रखी और चली गयी | सुधीर के पापा ने धूप में लेटे लेटे एक आँख खोली | "पिता जी! माँ ये डालें क्यों ला रही है ? क्या करेगी इन लकड़ियों का ?" सुधीर ने माँ की ओर दिखाकर पूछा | जमनोत्री ने कटी शाखों का गट्ठर बना लिया | उसे पीठ पर लादकर लाने लगी | "पता नहीं बेटे! तभी तो मैं इसे गंवार कहता हूँ |" सुधीर के पापा हँसते हुए बोले | "अरे सूखी लकड़ियाँ बहुत काम आती हैं |" जमनोत्री ने झुके झुके ही जवाब दिया | सुधीर के पापा ने गट्ठर को पीठ से उतार दिया | "लेकिन अब तो गैस है, और नहाने के लिए गीज़र है बाथरूम में | फिर भी ?" सुधीर ने अपना तर्क प्रस्तुत किया | जिस पर जवाब देने की जमनोत्री की कोई इच्छा नहीं थी | सुधीर के पापा, जमनोत्री का ये भाव समझ गए | "और रखोगे कहाँ ? छत पे ? छत खराब हो जायेगी |" सुधीर ने आखिरी तर्क प्रस्तुत किया | "ए जमनोत्री! और भी हैं अभी वहां, रास्ते के दूसरी तरफ, जल्दी चल" छत के दूसरे छोर से जेठानी की आवाज आई | 

सुधीर चुपचाप माँ को शाखें ला लाके इकट्ठी करता हुआ देखता रहा | बीच बीच में सुधीर के पापा, सुधीर की ओर देखकर सांत्वना भरे स्वर में कहते रहे "गंवार है, कभी शहर देखा ही नहीं, तो ये हरकत तो करेगी ही |" सुधीर जानता था कि पापा की इसमें मौन सहमति है | बहू अपनी अमेरिकन साड़ी की दुर्दशा देख रही थी | सड़क के दूसरे छोर से जमनोत्री और जेठानी खिलखिलाते हुए आ रहे थे | प्रतीक भी एक छोटी सी डाल कंधे पे लादके चला आ रहा था, उन छोटे छोटे बच्चों की तरह जो बड़ी दीदी के साथ पहली बार स्वेटा पीठ पे बाँध के घास-पात लेने जाते हैं | इधर सुधीर के मोबाइल पे गाना अभी भी बज रहा था

 'अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूँ,
  अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ|'