Wednesday, December 22, 2010

हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी


"अभी न, मैं तुम्हारे लिए कहानी का टाइटल सोच रही थी "
"अच्छा ? क्या सोचा ?"
"अभी मैं आ रही थी न, स्टैंड पे... तो वही कुत्ता था वहाँ पे परसों वाला, रो रहा था... उसे देख के मुझे टाइटल सूझी"
"कुत्ते को देख के टाइटल ?" मैं हँसने लगा, वो भी हँसने लगी |
"अरे सुनो न स्टुपिड! तुम मुझे भुला दोगे नहीं तो |"
"ओके बाबा, बोलो |"
"हाँ तो टाइटल है, हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी |"
"वाह क्या टाइटल है !" मैंने उपहास किया |
"अच्छा है न ?"
"हाँ , लेकिन कुत्ते से तुम्हें ये टाइटल क्यों सूझा ? कुत्ता तो पूरे टाइटल में कहीं नहीं है |" मैंने अपनी हँसी को किसी तरह रोका हुआ था |
"पता नहीं" वो थोड़ा उदास हो गयी, "मैंने बहुत कोशिश किया, लेकिन उसके लिए जगह ही नहीं बनी टाइटल में, मे बी दैट लिल डॉग इंस्पायर्ड मी |"
"हाँ, शायद | तुम इसका नाम हीरो की कहानी, कुत्ते की जुबानी भी तो रख सकते थे |"
"तुमको मेरा टाइटल पसंद आया न ?" उसने उम्मीद से पूछा |
"मैं परिंदों का पसीना रख लेता हूँ टाइटल |"
"क्या ? परिंदों का क्या ?"
"पसीना .. पसीना" मैंने कहा |
"मजाक मत करो, मैंने बहुत सीरियसली टाइटल सोचा था, और तुम मजाक समझते रहते हो | मैं जो कुछ भी बोली हूँ तुम कभी सीरियसली नहीं लेते |"
उफ़ ... ये तो गलती हो गयी "अरे बाबा! मैं भी सीरियसली बोल रहा हूँ | कहानी में काफी स्ट्रगल होगा, तो परिंदों का पसीना तो आएगा  न ?"
"हाँ, वो तो है |" उससे सहमति मिल गयी |
"तुम लिखो मगर कुछ, ठीक है ?"
"ओके !" मैं अभी भी 'देश पराया' के 'लियाक़त मियां' की प्रतिक्रिया के बारे में सोच रहा था |
"स्टुपिड! मैं सीरियसली बोल रही हूँ | तुम लिखो कुछ, लिखते रहो, मैं चाहती हूँ कि तुम बहुत बड़ा राइटर बनो |"
"नाश्ता किया तुमने ?" उसने मुझे लिखते हुए पकड़ लिया था, वक़्त की नजाक़त देखते हुए मैं स्वर में काफी लय घोल लेता हूँ |
"हाँ ! मैं न बिस्किट खाई | तुमने किया नाश्ता ?"
"हाँ ! मैं न रोटी सब्जी खाई |"
"हे ! तुम मेरा नकली कर रहे हो |"
"नहीं तो |"
"तुम कर रहे हो , नहीं तो तुम फेमिनिन क्यों बोल रहे हो ?"
"ओके बाबा ! मैं रोटी सब्जी खाया | अब खुश ?"
"आँ ..हाँ ...आँ ......"
"अरे अब क्या हुआ ?"
"तुम मेरा मजाक बना रहे हो | मैंने क्या गलत बोला ?"
 "कुछ नहीं !"
"मैं बहुत अच्छी हिंदी बोलती हूँ स्टुपिड ! तुमसे तो अच्छा ही बोलती हूँ | बस तुम्हारे सामने नहीं बोल पाती |"
"क्यूँ ?"
"अरे छोडो न ये सब ! तुमने क्या खाया नाश्ते में ?"
"अरे बाबा ! रोटी सब्जी"
"कौन सा सब्जी ?"
"कैप्सिकम"
"पता था मुझे ! अब तुम हफ्ते भर तक कैप्सिकम बनाते रहोगे ? है न ? है न !! "
"हाँ" मैं भी मुस्कुरा पड़ा | वैसे ये अतिश्योक्ति अलंकार है | मैं सब्जी सिर्फ तीन दिन तक की लेता हूँ |
"अच्छा ! तो फिर कब छोड़ रहे हो तुम कॉलेज ?"
"मम्मी कह रही है कि दस दिन में ही हम लोग वापस चले जायेंगे ?"
"गुवाहाटी ?"
"गुवाहाटी नहीं स्टुपिड गोहाटी ..." हँसती है , "गुवाहाटी .. इट सीम्स .." फिर से हँसने लगती है |
"ओके ! तुम मुझे भूल जाओगी न |" मैं थोडा संजीदापन लाने की कोशिश करता हूँ | जब मेरा ध्यान उससे बात करने पर नहीं होता है तो मैं ऐसी ही कोई बात निकाल लेता हूँ |
"हाँ ! तुम अपनी डायरी में लिखना , आज तारीख 13 दि. 2010 , वो मुझे भूल जायेगी | मैं उससे पूछा कि तुम मुझे भूल जाओगी न ? उसने कुछ नहीं कहा और हँसने लगी |"


आज तारीख 13 दि. 20, मैं उससे मिला , दस साल बाद, आज भी उसकी काजल लगी आँखें  बहुत खूबसूरत हैं |
"शादी की ?" वो मुझसे पूछती है |
"नहीं !" मेरा मुख़्तसर सा जवाब होता है |
"क्यों ?"
"ऐसे ही !" तुम चली गयी, फिर कभी ये सवाल जेहन में आया ही नहीं |
"क्यों नहीं आया ?" वो आज भी उतनी ही बेबाक है |
"बस ऐसे ही, अरे कभी सोचा नहीं बाबा |"
"तुमने ?"
"तुम तो बड़े राइटर बन गए हो | तुमने लिखी वो कहानी ?"
"तुम पहले बताओ, तुमने शादी नहीं की ?"
"मुझे एम बी ए करना था ? पी एच डी करना था |"
"तो पहले एम बी ए किया या पी एच डी "
"अरे मेरी कहानी ? तुमने लिखी या नहीं ?"
"अरे कौन सी कहानी बाबा ? तुमने क्या किया ? एम बी ए  या पी एच डी ?"
"कुछ भी नहीं "
"क्यों ?"
"अरे नहीं पता |"
"मेरा इंतज़ार कर रही थी |"
"हाँ ! और तो कोई काम नहीं था न ... इट सीम्स ..."
"तो दस साल तक तुम क्या करती रही ?"
"याद है, एक बार तुमने क्या कहा था ?"
"तुम पर मैंने हो न हो तो 10-12 हज़ार रूपये केवल बात करने में ही खर्च किये होंगे | अब मुझे क्या पता कि एक बार क्या कहा था |"
"स्टुपिड ! तुमने कहा था कि पहले अपनी औकात बनाओ, फिर मुझसे शादी की बात करना |" उसने छोटे बच्चों की तरह होंठ फैला लिए | "और तुमने ये भी कहा कि तुम्हें खुद नहीं पता कि तुम शादी करना भी चाहते हो या नहीं |"
"हाँ तो ?"
"तो मैंने औकात बना ली |"
"ऐसा क्या कर दिया तुमने ?"
"पता नहीं, पर तुम्हें अब मेरी जरूरत महसूस होती है न ... तुमने शादी नहीं की, लेकिन तुम 'गुवाहाटी' जा रहे हो ... अभी भी खुद खाना बना रहे हो ?" ख़ामोशी ट्रेन की धीमी चाल के साथ संगत कर रही है, "...तुमने लिखी न वो कहानी ?"
ट्रेन ने गति पकड़ ली थी |
"कब आ रहे हो मेरे घर ? मेरा हाथ मांगने के लिए ?" मैं पूछता हूँ |
वो मुस्कुरा देती है |

(हीरो की कहानी, परिंदे की जुबानी मीन्स जरूरी नहीं कि हर कहानी में लड़का और लड़की बिछुड़ जाएँ ...)