Saturday, December 24, 2011

मुर्दा



जिंदगी एक अवसाद है | एक मन पर गहरा रखा हुआ दुःख, जो सिर्फ घाव करता जाता है | और जीना , जीना एक नश्तर है , डॉक्टर |
ऐसा नहीं है, मेरी तरफ देखो , देखो मेरी तरफ | आँखें बंद मत करना | जीना , जीना है , जैसे मरना मरना | जब तक ये हो रहा है, इसे होने दो | इसे रोको मत |
तो आप ऐसा क्यों नहीं समझ लेते कि अभी मौत हो रही है है , इसे भी होने दो | मुझे मत रोको |

डॉक्टर , लोग कितने गरीब हैं, भूखे सो जाते हैं , भूखे मर जाते हैं | तुम्हें एक मेरी जान बचाने से क्या मिलेगा ?
तुम जानना चाहते हो , मेरे दिल में उन लोगों के लिए कितनी हमदर्दी है ? जरा भी नहीं | मरने वाले को मैं खुद अपने हाथों से मार देना चाहता हूँ | जब कभी सामने सामने किसी को मरता हुआ देखता हूँ , तो बहुत आराम से उसकी मौत देखता हूँ | जैसे परदे पर कोई रूमानी सिनेमा चल रहा हो | मुझे मौत पसंद है , मरने की हद तक |
फिर मैं क्यूँ डॉक्टर ! मुझे क्यों बचा रहे हो ?
क्यूंकि , मैं खुद को बचा रहा हूँ , अपनी आत्मा का वो हिस्सा बचा रहा हूँ , जिसे मैंने खुद से कई साल पहले अलग कर लिया था | अपने बेटे को बचा रहा हूँ, जिसे मैं बचा नहीं पाया |

अपने अन्दर एक ऊर्जा सी महसूस कर रहा हूँ , बावजूद इसके कि मैंने सुबह से कुछ नहीं खाया है | इसे एब्सर्ड एनर्जी का नाम दूंगा मैं | शाम घिरने का इंतज़ार कर रहा हूँ, ताकि मैं फिर वापस होस्टल जाकर खाना खा सकूँ | बस बैठा हूँ, यहाँ चट्टान पे देखते हुए सामने घाटियों में लगे चीड़ के पेड़ | डूबते सूरज की ओर बैठा हूँ पीठ करके या जिंदगी ने शायद सिखा दिया है ये सब | तुम एक पल को याद आते हो और मैं दूसरे पल चीड़ के जंगल में नामालूम सी कुछ आवाजें ढूंढता हूँ | जैसे तफ्तीश कर रहा हूँ कि हाँ, मैं एक दुनिया में रहता हूँ | ऐसे ग्रह में जहाँ आज भी जीवन है | पत्तों की सरसराहट, बियाबान में उड़ती चिड़िया, कोई तो दिखे, मेरे अहसासों को नम कर दे जो | हम वक़्त के दो टुकडो की तरह हैं, जो कभी नहीं मिलते | एक समानांतर चलती हुई जिंदगी, जैसा वे होलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्मों में दिखाते है | तुम 2006  हो और मैं 2011 , लेकिन दोनों हैं, बीता कोई नहीं , गुज़रा कुछ नहीं | तुम्हारे 2006  वाले संस्करण में मैं नहीं, मेरे 2011  में तुम कहीं खो गए | क्या वक़्त ऐसे ही चलता है , हर वक़्त |

प्यास ... कभी ख़त्म नहीं होती | और, और, और बढती जाती है | तुम्हें आखिरी बार देखना, जैसे आखिरी बार देखना हो जाता है | बार -बार चुभता है | क्या कहूँ ? कैसे इस बात को लिखूं, या सोचूं ? कि तुम्हें समझा सकूँ | एक खंजर की तरह, नहीं... नहीं... नहीं, खंजर नहीं, चाकू या कोई और धारदार चीज जैसा कुछ नहीं | स्टॉप बीइंग मेलोद्रमाटिक शैली, तुम कह उठोगे | नहीं, कोई खंजर या चाक़ू नहीं, लेकिन एक अजीब खिंचाव है | एक अजीब सा ख़याल है | तुम्हारा मेरी जिंदगी से जाना तुम कभी नहीं समझ पाओगे | ये कुछ ऐसा है जैसे दुनिया से सब लोग चले जायेंगे | उनकी निशानियाँ, फोटोग्राफ्स, रिकार्डेड आवाजें, टेलीविजन और रेडिओ आवाजें सब | और मैं बेसहारा, एक कमरे से दूसरे कमरे और एक घर से दूसरे घर भाग रहा हूँ | मुझे पता भी नहीं मैं क्या ढूंढ रहा हूँ | मुझे नहीं पता मैं कहाँ था और कहाँ आ गया हूँ | कौन रहता था इनमें ? क्या इन्हें घर कहते हैं ? क्या इनमे कोई जीता जागता कुछ था ?? क्या था ये ? क्या है ये? क्या सवाल है ? मैं क्या हूँ ? मैं चीख रहा हूँ, जाने क्या कोई भाषा है ? जाने क्या कोई आवाज ही है ? नहीं पता ? जो मेरी आवाज सुन सकता है, जवाब दो ... जवाब दो मुर्दों, कि मैं यहाँ सवालों को नहीं पहचानता |

बचपन में देखे हुए कुछ रंग याद हैं, जिनका तब नाम पता नहीं था | बस एक चमत्कार की तरह आँखों में कौंधा करते थे | अब रंगों के नाम ढूंढ सकता हूँ पर रामधेनु अब नहीं दिखता | कोई चमत्कार नहीं होता, मासूमियत पर कलम चुभो दी हमने, खून की नीली लकीर कागज़ की गन्दी संकरी नालियों से बह रहा है | भागा भागा स्कूल से मैं आया तो पता चला दिलीप भैया जा चुके थे | आज दिलीप भैया गाँव जाने वाले थे, इजा ने कहा कि भैया तुम्हारे स्कूल से आने के बाद जायेंगे, इसी वायदे पर मैं आज की परीक्षा में गया था | मैं भागकर उनके घर गया | घर का दरवाजा खुला था, अंकल बाहर थे | कमरा वैसा ही लग रहा था, जैसा किसी के जाने के बाद लगना चाहिए | अलमारी में रखी किताबें और गाने के कैसेटों की जगह खालीपन पसरा हुआ था | एक तरफ गोल करके रखा हुआ बिस्तरबंद भी गायब था | दो दिन से सारा सामान भी समेट लिया गया था | लेकिन तब महसूस नहीं था कि जाना क्या होता है, महसूस नहीं हुआ कि वे सचमुच चले जायेंगे | आज अचानक खाली जगह देखकर महसूस होता है वे वाकई चले गए हैं | और हाँ, जाना होता किसी का चले जाना | उसका तुम्हारी जिंदगी से एक हिस्सा अपने साथ लेके जाना | कई बार चीजें कैसे वजूद की जगह घेर लेती हैं | जैसे हमारा वजूद भी सिर्फ एक चीज हो... जो अगर है तो पास है, पास नहीं है तो जैसे है ही नहीं | चले तो भैया बहुत पहले ही गए थे, लेकिन चीजें वहीँ थीं, आज चीजें भी नहीं थीं | इजा ने कहा कि वे वापस आयेंगे | लेकिन जैसे मेरा दिल मुझे बहुत पहले ही बता चुका हो कि वे वापस नहीं आयेंगे |

वो मेरी जिंदगी का पहला खोना था | मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ मुझे खोने की आदत है | चीजों को, लोगों को ... खुद को तो बहुत बाद में सीखा | दिलीप भैया की पहली चिट्ठी अलका दीदी तक मैंने ही पहुंचाई थी, और अलका दीदी की शादी का कार्ड दिलीप भैया के घर देने के लिए मैं ही गया था | मुझे याद है जब दिलीप भैया शर्ट निकालने के लिए अलमारी खोलते थे तो उसमे से एक अजीब सी खुशबू आती थी, सूख चुके गुलाबों के जैसी | खिड़की पर अटकाए शीशे पर वो करीने से बाल संवारते थे, और आगे हल्का सा पफ देते थे | भौहों को ऊपर करके देखते थे | फिर आईने में मुझे देखकर हँसते थे, एक हलकी हंसी | मैं स्कूल से घर आते ही, उनके घर भागा चला आता था, उन्हें देखने के लिए | इजा की मुझे घर पर रोकने की तमाम कोशिशें नाकाम होती थीं | मैं हर काम जल्दी जल्दी निबटा देता था, ताकि इजा मुझे दिलीप भैया के घर जाने दे | भैया अक्सर शाम को घूमने जाने के लिए निकल रहे होते थे | उन्हें तैयार होते हुए देखना मेरे लिए किसी चमत्कार की तरह था, कई रंगों की तरह जो अचानक आँखों में कौंधा करते हैं | एक शाम दिलीप भैया आये तो काफी खुश थे | मुझे बांहों में लिया, घुमा कर हवा में उछाला | अंग्रेजी में कुछ कहा जिसमें मुझे सिर्फ डार्लिंग ही समझ आया, मुझे बहुत शर्म आई, जैसे किसी ने मुझे कोई गलत काम करते हुए पकड़ लिया हो | मुझे कुर्सी पर बिठाकर उन्होंने हलके से आवाज में कोई गीत चला दिया | जिसके बोल मुझे याद नहीं लेकिन संगीत जैसे आज भी कानों में गुनगुनाता हो | वे खुद आँखें बंद करके लेट गए | "ओह आई एम् इन लव !" उन्होंने जैसे गुनगुनाते हुए कहा | मैं उनकी किताबों से खेल रहा था | उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया | "आज मैंने एक लड़की को चूमा है |" उन्होंने कहा | मैं शर्म में डूब गया | "तुम जानते हो लड़की को चूमना क्या होता है ?" मैंने शर्मिंदगी को एक हद तक ढकते हुए नहीं में गर्दन हिलाई | "आज जाना है मैंने भी | एक नशा है, मरने से पहले एक घूँट दुनिया की सबसे नशीली शराब पीने जैसा है | एक भरोसा जिन्दा रहने के लिए | तुम अभी बहुत छोटे हो, तुम नहीं जानते, जब तुम बड़े होओगे तुम्हें किसी से प्यार होगा तो तुम समझोगे |" मैं कभी नहीं समझ पाया |

एक छोटी सी चोरी मैंने की है | मैंने आपकी एक चिट्ठी पढ़ी है भैया | मुझे इस बात का कई दिन तक डर लगा रहा कि आपको पता चल जाएगा | बहुत दिन तक जब आप कुछ नहीं बोले तो मुझे लगा कि आपको पता चल गया | पर आप बहुत दिन से गुमसुम थे, कुछ बोल ही नहीं रहे थे, इसलिए मैंने अलका दीदी की एक चिट्ठी जो उन्होंने आपके लिए भेजी थी ...

प्रियतम,
आप हमें समझेंगे और हम पर नाराज नहीं होंगे | हम खुद भी तो छुप छुप के रो रहे हैं, लेकिन आंसू किसी को नहीं दिखा सकते | क्या हमारा प्यार इतना खुदगर्ज़ हो जाएगा कि हम दूसरे किसी के सुख दुःख की परवाह ही नहीं करेंगे | आप हमारे अनमोल धरोहर की तरह रहेंगे | किसी को हम ऐसा तोहफा दिखा भी नहीं सकेंगे , जिंदगी भर लेकिन आपकी यादों को सीने से लगा के रहेंगे | रातों को जब सब सो जायेंगे तो हम चुपके चुपके रोया करेंगे | और इस उम्मीद में खुद को तसल्ली देंगे कि उस घडी हमें कोई जुदा नहीं कर सकता |
तुम्हारी और हर जनम में तुम्हारी,
अलका 

अलका दीदी को मैंने सिर्फ हँसते हुए ही देखा था, उसके पहले भी और उसके बाद भी |

गाँव से रमेश भैया आये थे | मैं जब घर पहुंचा तो उन्हें देखकर मुझे कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई, मैं उन्हें ज्यादा पसंद नहीं करता था | उन्होंने आते ही मेरी तरफ देखते हुए हलके से मुस्कुराते से कहा | "शैली, दादी मर गई |" दादी मर गई, तीन शब्दों में ही किसी की जिंदगी कैसे ख़तम हो जाती है | शाम को हम चारों भाई बहन, सुमित के घर खाने पर गए | सुमित की माँजी हमें लेने के लिए आई | घर पर उस रात खाना नहीं बना था | इजा ने कहा कि जब घर में कभी मौत होती है तो उस रात खाना नहीं पकता है | इजा और पिताजी ने उस रात खाना नहीं खाया | अगले दिन पिताजी हमें बाल कटवाने के लिए ले गए | इस रास्ते गंगा की तरफ मैं कभी नहीं आया था | पिताजी ने अपने दाढ़ी बनाने वाले उस्तरे से हमारे बाल काटे | मैं रो रहा था, मुझे काफी दर्द महसूस हो रहा था | पिताजी बोलते जा रहे थे, तू रो बेटा | बहुत प्यारी थी तेरी दादी | तुझे बहुत मानती थी | जब भी तू गाँव जाता था तो तुझे शहद खिलाती थी | मुझे सब कुछ पता था लेकिन पिताजी क्यों सब दोहरा रहे थे, मुझे बेहद अजीब सा लग रहा था | गंगा का वो किनारा आज भी मेरे डरावने सपनों में आता है | इतना दर्द तो तुझे सहना ही होगा बेटा | किसी अपने के लिए दर्द सहना होता है | माँ अपने सब बच्चों को बराबर प्यार देती है | बस कुछ बच्चे उस प्यार से वंचित रह जाते हैं | माँ गाँव में मर जाती है और बच्चे को पता भी नहीं चलता | गर्मी की हलकी सी लकीर मेरे कान के पास से बहने लगी | पिता के हाथ रुक गए थे , मैंने पीछे मुड़कर देखा |

मुझे दादी के प्यार के बारे में कुछ ख़ास पता नहीं था | हाँ, पर गाँव जाने पर दादी जरुर मुझसे भजन सुनती, गीता सार सुनाने को कहती, और सबसे ख़ास चीज जो मुझे याद थी वो था उनका संदूकची में रखा हुआ शहद का जार, जिसके अन्दर वो ऊँगली डुबाती थी, थोडा ऊँगली को घुमाकर गाढ़ा पीला रसीला द्रव्य निकालती थी, और मेरी हथेली पर धर देती थी | शहर में कुछ खिलाता नहीं है तेरा पिताजी तुझको , बार बार यही बोलती थी | अरसे बाद मैंने इजा से पूछा था कि क्या सचमुच दादी मुझसे बहुत प्यार करती थी | इजा ने मुझे ऐसी नजरों से देखा जैसे मैंने उनसे कोई ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रपति का नाम पूछ लिया हो, फिर धीरे से कहा, नहीं | तेरी दादी तुझे मार डालना चाहती थी जब तू पैदा हुआ था, उन्हें लगा था कि मैं तीसरी औलाद भी लड़की ही जनने वाली हूँ |

"साले ! छक्के !" सुनील ने मेरे सर पर हाथ मारा | "जब मैंने तुझसे कहा था कि खिड़की वाली सीट मेरी है तो तेरी बैठने की हिम्मत कैसे हुई |" मुझे पता था ऐसा कुछ होने वाला है | काफी देर तक खुद को समझाता भी रहा कि जब वो ऐसा कहेगा तो मैं क्या करूँगा | लेकिन उसके ऐसा करते ही मैं खुद को नहीं रोक पाया और रोने लगा | मुझे वो सारे दिन याद आये जब बचपन से लोग मुझे चिढाते रहते थे | सुनील मेरे साथ मेरी ही क्लास में पढता था | पांचवी के बाद पिताजी ने मुझे जिस नए स्कूल में दाखिल किया था वो काफी दूर था और हमें लाने ले जाने के लिए एक गाड़ी का बंदोबस्त भी | उसी में कुछ नए दोस्त भी बने थे | सुनील अपने घर से पिता के पैसे चुरा के लाता जिसे हम लोग विडियो गेम पार्लर और चोकोबार खाने में उड़ा देते | एक दिन हम लोगों की गाड़ी छूट गयी | मैं पैदल चलते हुए घर पहुंचा | इजा देहरी पर ही बैठी थी | मैं गर्दन झुकाए घर के अन्दर घुसा | इजा ने मेरी तरफ देखे बिना कहा, आ गया तू, ले खाना खा ले, ठंडा हो गया है | मैं फिर गरम कर दूँ | मैं जब किचन में बैठा , तो मैं गर्दन नीचे किये हुए था | जितनी कोशिश कर सकता था इजा से नजरें बचाने की, उतनी कोशिश कर रहा था | "तुझे आज इतनी देर क्यूँ हो गयी" इजा का पूछना था कि मैं रोने लगा | जोर जोर से रोने लगा | रोते रोते मैंने उन्हें बताया कि सुनील घर से पैसे चुरा के लाता है और हम सब लोग उसके पैसों से चीज खाते हैं | इजा कुछ नहीं बोली, लेकिन मैं रोता रहा, गुस्सा होता रहा | अगले दिन से मैंने सुनील के इन सब कामों में साथ देना बंद कर दिया | अगले दो साल तक मैं शाम को स्कूल से आने के बाद हर रोज चार लोगों से लड़ता रहा | हर रोज, बिना रुके, हर रोज़ ... लेकिन मैंने हार नहीं मानी | स्कूल ख़तम होने के बाद, गाड़ी में जाने से पहले मैं खुद को तैयार कर लेता था कि मुझे लड़ना है | मैं रोता था, लड़ता था | मार खाता था, और फिर लड़ता था | बोबी और मैं बचपन के दोस्त थे, और बोबी भी उन चार लोगों में था | ये रिश्तों से मेरा पहला तल्ख़ परिचय था | और मेरी पहली हत्या,  मेरे भोलेपन की |

"गोविन्द, घर से भाग गया है | आजकल किसी नागनाथ मंदिर के साधू के यहाँ डेरा जमाया है | दिन भर चिलम चढ़ाए पड़ा रहता है |" पिताजी, इजा को ये सब बता रहे थे | "इस बार उसने नया ड्रामा किया | जब उसको कमरे में बंद किया तो उसने सारे कपडे फाड़ के फेंक दिए और खिड़की के रास्ते कमरे से भाग आया | पूरे गाँव भर में नंगा घूमा |" मेरे सामने गोविन्द चाचा का चेहरा घूम गया | घर के सारे बच्चों में से चाचा सिर्फ मुझे पसंद करते थे | इजा इसका कारण बताती है, चाचा इजा को बहुत मानते थे, बहुत ज्यादा | और चाचा ने इजा से कहा था, "भाभी तुम्हारी ये संतान दुनिया में तुम्हारा नाम करेगी | आज इसके परताप से मेरी जान बची है |" चाचा जिस बस से घर आ रहे थे वो खड्डे में गिर गयी, बच गए खुशनसीब लोगों में चाचा भी थे | चाचा, ये अंदाजा नहीं लगा सके कि मर गए लोगों के घरवालों के लिए मैं अँधेरा लेके आया हूँ | जब मैं बहुत छोटा था तो चाचा इजा से कहते कि भाभी जैली के साथ मैं सोऊंगा | इजा हंसती और पूछती कि तू अपने बच्चों के पास क्यों नहीं जाता | उनके बिस्तर से बदबू आती है, चाचा जवाब देते | "अबे जैली |" चाचा मुझे इसी नाम से बुलाते थे | जब भी गाँव जाता था | चाचा हमेशा कुछ नयी किताब मुझे देते थे, ज्यादातर वे होती थी जो मुझे मुझसे दो कदम आगे के लगती थी | अभी इस बार वे कविताओं की कोई किताब लाये थे, जिसमें मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी | महादेवी वर्मा ?!? 

यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है, 

सुधि से सुरभित स्नेह-धुले, 
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है; 
दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!

महादेवी वर्मा ?!? मुझे आज तक कवितायें समझ भी नहीं आई | एक पहेली जैसी हैं, बस पहेलियों की तरह ही मुझे आकर्षित करती रही | उन पहेलियों की तरह जिनका जवाब मैं कभी ढूंढ नहीं पाया | जैसे, गोविन्द चाचा का नाम आने पर इजा चुपचाप रह जाती हैं | कोई प्रतिक्रिया नहीं देती | जैसे, गोविन्द चाचा का मुझे देखकर एकदम गले से लगा लेना | रोते हुए कहना, मैं बहुत पहले ही दुनिया छोड़ देता, लेकिन तू, तू मुझे नहीं जाने देगा | मैं अविचलित खड़ा रहता | गोविन्द चाचा क्यों मेरी वजह से रुके हैं ? वे दुनिया छोड़ के जायेंगे कहाँ ? क्या वे मरने की बात कर रहे हैं | ये सब भी पहेलियाँ थी |

लौ ने वर्ती को जाना है 

वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने 
रज का अंचल पहचाना है; 
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!

जब यह दीप थके तब आना। 

"मैं कभी किसी के काम नहीं आ सका |" पिताजी रो रहे थे, मैंने पिताजी को रोते हुए दूसरी बार देखा था | मैं समझ गया था कि क्या हुआ होगा | दादाजी के मरने की खबर गाँव से आई थी | लेकिन इस बार पिताजी अपने आंसू छुपाने की कोशिश नहीं कर रहे थे | मैं चुपचाप बाहर किसी सलून में जाकर बाल कटा आया | "मैं हमेशा अपने घर परिवार में इतना उलझा रहा कि अपने माँ-बाप की सेवा भी नहीं कर सका |" पिताजी का श्रवण - स्वप्न जारी था | चार साल से घिसटते दादा को देखकर हर किसी ने यही कहा था कि भगवान् करे उन्हें जल्दी मौत आ जाये | अच्छे भले बुढापे में खुद चलकर सत्संग करने जाते थे | एक दिन अचानक उनकी रीड की हड्डी खिसकी और उसके बाद वे हमेशा के लिए अपने शरीर में कैद हो गए | इतने अच्छे लोगों के साथ, जो दिन रात उसका नाम सुमिरन करते हैं, भगवान् भी कैसा अन्याय करता है | है न ? उन्हें उनके पैरों पे खड़ा करने की मैंने और सुधी ने बहुत कोशिश की | लेकिन ये नामुमकिन काम था | इजा ने जीते जी उन्हें कभी स्पर्श नहीं किया | चरणों को प्रणाम भी दो गज दूरी की जमीन छूकर किया | वही इजा अब उनका गू-मूत साफ़ करती थी | मैंने यह सब करने से साफ़ मना कर दिया | दादा को भूलने की बीमारी भी घिर आने लगी | अक्सर उन्हें अपने बीते दिनों के आम के बगीचे की याद आती जो शायद उनका दिवा स्वप्न रहा हो, जो कभी पूरा नहीं हुआ | इन्हीं दिनों मैंने अपने दिवा स्वप्न शुरू किये थे, और मुझे अपने बारे में जो बात पता चली उसने मुझे खुद अन्दर तक डरा दिया |

इजा के सिरहाने बैठा था | इजा ने आँखें खोली, "अभी तू मुझे मार डालने की कोशिश कर रहा था, अभी मेरे सिरहाने बैठा है ? लाड़ जता रहा है ?" इजा की आँखें मुझे खुद से डरा गयी | सामने काले शीशे पर मेरी काली परछाई बन रही थी | "इजा! ये मैं हूँ | तेरा शैली" किसी तरह हिम्मत जुटाकर मैंने कहा | इजा फिर से सो गयी | मैं रोने लगा, बस अब एक जमाने से मेरे आंसू बाहर दिखने बंद हो गए थे | "शैली ! शैली !" इजा फिर से उठी | "जा बेटा थोडा धूप बाल दे इस कमरे में |" मैं बाहर रिसेप्शन पर गया | मैंने नर्स से पूछा, "सिस्टर कैन आई हेव सम धूपस्टिक्स एंड मचेस, प्लीज़ !" "क्यूँ ?" नर्स ने मेरी तरफ देखा | "अक्चुली, पेशेंट को थोडा पूजा करनी है |" मैं धूप लेकर रूम पर गया | "तू आ गया" इजा ने कहा | इजा को बोलने में तकलीफ हो रही थी, फिर भी वे बोलती जा रही थी | "अभी उधर एक विडाल था, वहां |" मैंने इजा की नजरों का पीछा किया, वे पंखें पर अटकीं थी | "वहां से उसने छलांग लगाईं और खिड़की से बाहर | मुझे लगा कि वो मेरे ऊपर कूद जायेगी |" इजा अब मैं आ गया हूँ, मैंने खिड़की खोलने के लिए हाथ बढाया | "नहीं, नहीं खिड़की मत खोलना, वो यमराज है मेरे प्राण लेने को आया है |" एक ठन्डे डर ने मेरे कानों को जकड लिया | नहीं इजा नहीं, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा | मैंने झुककर इजा के बाल सूंघे | मेरी आँखों का गीलापन इजा के माथे पर तैर आया था | इजा डरो मत, अभी तो मैं धूप भी ले आया हूँ | और मैंने धूप जला दी | जब मैंने मुड़कर देखा तो इजा सो गयी थी | और अब मैं चैन से बैठ कर रो सकता था |

पिता ने इजा को देखने से मना कर दिया | मुझे नहीं जाना उसके पास, मुझे ऑफिस जाने के लिए देर हो रही है | शीला, मीना ने जल्दी जल्दी खाना पकाया | उतनी देर तक इजा के पास सुधी बैठा रहा | फिर सुधी को भी स्कूल जाना होगा | मुझे कहीं नहीं जाना था, क्योंकि मैं इंजीनियरिंग कम्पीटीशन की तैयारी कर रहा था | आपका बेटा बहुत होशियार है, डॉक्टर ने इजा से कहा | "मैंने देखा है उसे, आपके पास बैठा रहता है, और अपनी किताब पढता रहता हो | तुम जरूर आई आई टी निकालोगे बेटा | जरूर | ब्लेस यू |" अगले इतवार को मेरा रिजल्ट आना था | जब मैं रिजल्ट लेकर घर आया तो इजा....

इजा ,
इजा 
सुंदरी देवी, इजा जब पैदा हुई तो उनका यही नाम था |


और तब तुम मेरी जिंदगी में आये | मुझे खुद नहीं पता कि मैंने तुम्हें और तुमने मुझे कैसे चुना | बस ऐसे ही , एक नाजुक वक़्त में, शायद जिंदगी को मुझ पर रहम आया हो, या शायद उसके मजाक की पंचलाइन अभी बाकी थी | मुझे अंदाजा तो था, लेकिन मुझे यकीन नहीं था कि मैं ? पिताजी मुझे इस बात के लिए ताना मारा करते थे | घृणा से मुझे देखते थे | बहनें मेरी तरफ अजीब दया भरी नजरों से देखती थी | और सुधीन्द्र, मेरा छोटू सुधी वो मुझसे कटने सा लगा था | पिताजी ने मुझे धमकी दी कि वे अपनी जान ले लेंगे अगर उन्होंने दुबारा ऐसा कुछ मेरे बारे में सुना | उस वक़्त मुझे महसूस हुआ कि दादी मेरी जान लेकर मुझपे शायद एक अहसान ही करती | वो वाकई मुझसे बहुत प्यार करती थी | दादा -दादी, गोविन्द चाचा, इजा, पिताजी, मैं जिन्दा लाशों और मुर्दा लाशों के बीच जी रहा था | तुम क्यूँ मेरी जिदगी में चले आये ? नहीं .. नहीं .. ये सवाल तुम्हारे लिए वाजिब नहीं है | मुझे खुद से पूछना चाहिए कि भगवान् ने मुझे क्यूँ ऐसा बनाया ? मुझे याद है, जब पहली बार तुम्हारे होंठों को छुआ था | अन्दर बहुत कुछ टूटा था, एक चिड़िया को जैसे पिंजरे से खोल दिया हो और वो नहीं समझ पा रही हो कि जाए तो कहाँ जाए | मैं यही था, यही था मैं, तुमने बस मुझमे सांस भर दी | मैं जी भर के रोया था, उस वक़्त भी और घर आकर भी | जब घर आकर मैंने गुलाम अली चलाया था | तो मुझे अचानक दिलीप भैया याद आये,

खेंच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ्फतन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुंह छुपाना याद है |

'आज मैंने एक लड़की को चूमा है | तुम जानते हो लड़की को चूमना क्या होता है ?' मैं नहीं जानता दिलीप भैया | मैं कभी नहीं जान पाऊंगा |

फिर एक रोज मेरे नाम तुम्हारा ख़त आया था , वही ख़त जो मैंने चोरी से पढ़ा था |

शैली , 
यू विल ट्राई टु अंडरस्टेंड मी , एंड प्लीज़ डोंट गेट अंग्री | आई आल्सो डोंट लाइक इट दिस वे, बट कांट शो एनीवन माय हार्ट | वी डोंट वांट टु बी सो सेल्फिश देट इट रुइंस अदर'स लाइफ | यू आलवेज़ अ ट्रेजर तो माय लाइफ , अ प्रेसेंट फ्रॉम देट आलमाइटी व्हू मेड अस दिस वे | अ ट्रेजर , व्हिच आई कांट शो नो वन , बट विल कीप फोरेवर क्लोस तो माई चेस्ट | वी विल क्राई व्हेन दी वर्ल्ड विल फाल अस्लीप, एंड वे विल कीप रीमाइन्डिंग अवरसेल्व्स ओनली डेथ कैन कीप अस अपार्ट 
फोरेवर यौर्स,
विक्की 

एक चिड़िया जो उड़ती रहती है, इस उम्मीद में कि कहीं उसे उसका खोया हुआ झुण्ड वापस मिल जाए या भरी दुपहरी झाड़ियों के बीच जगह बनता अलमस्त हिरन, अचानक किसी शिकारी की आहट पर हलके से कानों को हिलाता है | दरवाजे की देहरी के पास बैठा कुत्ता जो हर आने जाने वाले पर भूंकता हो , ताकि उसकी तरफ भी इस व्यस्त दुनिया का ध्यान जाए | बीहड़ में बने मंदिर में चिलम चढ़ाता साधू | खाली पड़ा हुआ टिन शेड, एक दूर इकलौता सा अँधेरे में टिमटिमाता दिया | या डाक बंगले के भुतहे कमरे, जहाँ एक कमरे से दूसरे कमरे में एक पूरी जिंदगी का फासला रखा हो | एक अलमारी जिसके तहखाने में कैद हो कई ऐसे दस्तावेज जो खुले तो रिश्तों का भरोसा डिगा दें | एक बचपन में छुपकर की हुई बुरी हरकत हो जुबान पर आने से पहले ही चिपक जाती है तालू की किसी खोह में | एक रूखी शाम, जब जिंदगी ख़त्म करने की इच्छा सबसे प्रबल होती है | या एक बेतरतीब भागती हार्ड म्यूजिक की रात, जब नाचते गाते हुए जैसे अपने अंतर पर रखे बोझ से आँखें मूँद रहे हों , बेशक उसे हटा नहीं सकते | बेहोशी के आलम में होश खो बैठने का जिद्दीपना | देर रात अँधेरे में अपनी आत्मा को छुपाना खुद की ही नजरों से, या खूब चकाचौंध ताकि चेहरे की कालिख कोई फेस क्रीम जैसी निखर कर आये | जब लाइब्ररी को जाना जिंदगी से पलायन हो जाए, जब सिनेमा एक हारे हुए जुआरी का दांव हो | जब गम करना एस्केपिस्म हो जाए, जिंदगी ऐसे मोड़ पर क्यूँ आ जाती है |

तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा,
शैलेन्द्र

पी. एस. : आज मैंने दूसरी बार खुद को मारा है |


विक्की आहिस्ता क़दमों से अंदर आया | "क्यों?... क्यों" उसने एक बार फिर खुद से पूछा, जैसे जांच लेना चाहता हो कि जो कुछ वह पूछ रहा है, उसका कुछ मतलब भी बनता है या नहीं | मुर्दे जवाब नहीं देते, सो सवाल पूछने का मतलब नहीं बनता था, इसलिए उसने फिर नहीं पूछा | वह चुपचाप एक कोने में बैठ गया | अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच की जगह को दांतों के बीच कसकर काट लिया, लेकिन उसके आंसू नहीं निकले |
'अगर तुम्हें मरना ही था, तो मुझे क्यूं बताया ? चुपचाप मर जाते |' उसके होंठ फडफडा रहे थे | तुमसे पहले भी तो कई लोग मरे हैं | आगे भी मरते रहेंगे |' वह एक पल को चुप हुआ, उसने नजरें फेर लेनी चाही, लेकिन नहीं कर पाया | शैली जब चुपचाप सोता है तो बहुत प्यारा लगता है | बिलकुल जैसे कोई छोटा सा बच्चा | 'या चुपचाप जिन्दा रहे हैं, एक मुर्दे की सी जिंदगी जीते रहे | तुमने ऐसा क्या झेला है ? हाँ ठीक है, लोग मरते रहे तुम्हारे आसपास, मरते रहेंगे | फिर? क्या फर्क पड़ता है, जब तक हम जिन्दा है, हमारी साँसे चलती हैं | कल तुम जिन्दा थे, मुर्दों को देखते थे | आज मैं तुम्हें देख रहा हूँ | क्या फर्क पड़ेगा ? मैं जिन्दा रहूँगा | जीता रहूँगा | और तुम्हें और चिढाने के लिए जिन्दा रहूँगा | मैं जिन्दा रहूँगा, और देखूंगा कि एक दिन हम जैसे लोगों को पाप नहीं समझा जाएगा | और मैं बखुशी जिंदगी गुजारूँगा | घर बसाऊंगा, रहूँगा इसी अनैतिकता के नैतिक होने के इंतज़ार में | या खुद ही कोशिश करूँगा, ये सब बदलने की |' 
वह तेजी से चलते हुए उसके पास आया | उसके मन में आ रहा था कि उसे झकझोर दे | बेतहाशा उसे मारे, लेकिन वह ठिठक गया | उसके कान के पास जाकर सिर्फ इतना ही कहा -
'लेट मी टेल यू समथिंग, कीप दिस थिंग इन युअर फकिंग डेड ब्रेन | तुम हर बार हारे हो मिस्टर शैलेन्द्र मेहरा |'
'नोट दिस टाइम !' मुर्दा जिस्म के होंठों पर हलकी सी सिहरन हुई, और उसने आँखें खोल दी |