Sunday, September 23, 2012

एक सिंपल सी रात



 (कुछ भी लिखकर उसे डायरी मान लेने में हर्ज ही क्या है , आपका मनोरंजन होने की गारंटी नहीं है , क्योंकि आपसे पैसा नहीं ले रहा ।)

धी रात तक कंप्यूटर के सामने बैठकर कुछ पढ़ते रहना, पसंदीदा फिल्मों के पसंदीदा दृश्यों को देखकर किसी पात्र जैसा ही हो जाना, अँधेरे में उठकर पानी लेने के लिए जाते वक़्त महसूस करना कि कोई तुम्हारे साथ चल रहा है | फिर आहिस्ता से दबे पाँव खिड़की पर आकर तारों को देखना, अपना धुंधला प्रतिबिम्ब तारों की पृष्ठभूमि में, काँच को अपनी साँसों से आहिस्ता से छूना जैसे कोई अपना बहुत ही क़रीबी तुम्हें एक जन्म के बाद मिला हो | उन लम्हों को याद करना जो तुम्हारे सिवा किसी को पता ही न हो , कभी कभी खुद तुम्हें भी नहीं | रात के उन लम्हों में जब तुम बिलकुल अकेले हो, तुम अपने आप को देख सकते हो | तुम बहुत पहले ही हार चुके हो, अब कोई गुस्सा नहीं, किसी से कोई झगडा नहीं, नाराजगी भी भला क्या हो | मौत कितनी सुखद होती होगी | किसी से कोई पर्दा नहीं, कोई दूरी या नजदीकी नहीं | मैं मरने के बाद मोक्ष नहीं चाहता, पुनर्जन्म भी नहीं, मैं भूत बनना चाहता हूँ |

चार साढ़े चार बजते बजते अपने आप से थक जाते हो, आंखें खुद ही आराम करने का कोई बहाना ढूंढ लेना चाहती हैं | दिमाग बीच में साथ नहीं देना चाहता | आधे पाराग्राफ तक पहुंचते ही शुरू का सब कुछ भूल जाते हो, फिर यकीन होता है कि शायद सोना ही सही होगा , पाँच मिनट आंखें बन्द करते हो लेकिन नींद गायब हो जाती है | आह, रोना कितना आरामदेह है , करुणा कितना आरामदायक इमोशन है | गर्म आँसू ठन्डे गालों को जिंदगी की गर्माहट देता है | क्या चाहते हो ? अभी अगर मुझे कुछ चाहने को कहा गया ? कुछ मांगने को कहा गया तो क्या मांगूंगा ? क्या मांग सकता हूँ ? कुछ नहीं । वरदान भी एक तरह का अभिशाप ही होता है , जब आपके पास कोई इच्छा ही शेष न रहे |

ऑफिस में अगली सुबह बड़ी कमाल की होती है, और वो लिफ्ट जो आपको चौथे माले तक पहुंचाती है | भीड़-भरी वो लिफ्ट में आंखें बन्द करते हो और दिमाग हल्का सा घूम जाता है, और आप अपने को सिर्फ एक पल के लिए, महज एक पूरे पल के लिए किसी और दुनिया में महसूस करते हो, कोई और गैलेक्सी में  | इस एक पल के लिए मैं पूरी रात नहीं सोया था |