Monday, September 24, 2012

जगदम्बा मटन शाप


र रोज सुबह छः बजे ही उसकी आँख खुल जाती । वह आँखों को मसलता, कांच के परे दुनिया देखकर वक़्त का अंदाजा लगता और जाने अनजाने यह उम्मीद भी करता कि वक़्त कुछ तो बदला हो, सात बजे हों, पांच बजे हों .. पर छः नहीं, लेकिन सिरहाने रखी घडी के कांटे उसकी दोनों आँखों के बीच चमकते रहते । वह डर जाता, एक ही वक़्त पर उठना बूढ़े होने की निशानी है । शायद वह बूढा हो रहा है, इस उम्र में ही । या शायद वह एक बुढ़ापा जी रहा है , जिसके बाद एक दूसरा बुढापा भी है । जमीन पर पाँव रखते हुए उसे बाबु की याद आती है । जब वह छोटा था तो हमेशा बिस्तर से उठने से पहले हाथ लगाकर जमीन को छूकर माथे पे लगाता । ऐसा वो किसी आदत से मजबूर होकर नहीं, पूरी आस्था से करता था । बाबू को देखकर , यह आदत उसके अन्दर भी धंस गयी थी । मन से किये हुए कुछ काम भी महज आदतें होती है । जब तक हमारे साथ होती हैं , हमें लगता ही नहीं कि यह एक आदत है । बस करते जाते हैं , बेवजह । जब वह दौर पीछे छूट जाता है तो पता चलता है कि यह भी कोई आदत थी । चलता हुआ समय आदमी को अपने बारे में कई ऐसे सच बताता है, जिसे वह रुके क्षण में कभी महसूसता भी नहीं ।


"माँ का देहांत हो गया ।"
"..." कुछ पल के लिए मेरे गले से कोई आवाज ही नहीं निकल सकी । मैंने काफी कोशिशों के बाद जैसे बोलने की हिम्मत जुटाते हुए सिर्फ इतना कहा "कब ?"
"दो रात गये ।"

अपनी अपनी जिंदगी में जीते रहना, क्या हम अकेलेपन के पाप के दोषी नहीं हो गए हैं ?





दो लड़के अपनी बाइक से उतरते हैं । "अंकल , मटन का रेट  क्या चल रहा है?" बाहर नोटिस टंगा है , लेकिन मैं उनसे नहीं कहता । लड़के हैं , बुरा मान जायेंगे । "एक सौ अस्सी ।"
"तीन पाव ले जाएँ क्या ? या एक किलो ?" एक लड़का दुसरे से पूछता है ।
दूसरा अनिर्णय में सर हिलाता है ।
"एक किलो ज्यादा हो जायेगा । तीन पाव ठीक रहेगा । तीन पाव कर दो भैया ।"
उनके आने से पहले और उनके जाने के बाद रास्ते में सिर्फ धूल ही थी । मैं कुर्सी पर बैठकर सकाळ खोल लेता हूँ । अम्मा घर का काम निबटा कर दूकान की देहरी पर दोनों पैरों पर पालथी मारकर बैठ जाती है । धुप टुकड़ा टुकड़ा आगे बढ़ने की कोशिश करती , और मैं टुकड़ा टुकड़ा पीछे हटता जाता , लेकिन दिन के किसी पहर में मुझे पूरी तरह से हार मान लेनी पड़ती है । और मैं दूकान के सामने टीन शेड की छाया में चला जाता हूँ । एक समय जब यहाँ भूकंप आया था उससे पहले दामोदर का होटल था यहाँ पे । बच्चे सब दब गए, उसकी बूढी अम्मा के इस शोक में प्राण निकल गए । पत्नी और दामोदर ही बच गए । फिर खीसे में रखे पैसों के भरोसे ही वह बम्बई कहकर निकल गया । मैं दूकान में बची लकड़ी के टूटे तख्ते पर लेट जाता हूँ । आग में जल गए तख्ते पर सूरज का ठंडा ताप मुझे दुबारा उसी समय में पहुंचा देता है । सुनीता से मेरा ब्याह तय हुआ था , लेकिन बाबू जी के गुज़र जाने के बाद घर की माली हालत खराब हो गयी । सुनीता के बाबा ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी । और वो कहीं और, कहीं और न होकर दामोदर के साथ थी । दामोदर मेरे साथ ही लड़की देखने गया था , मेरे वास्ते उसे सुनीता पसंद भी आई । 

"दूर रह !!! हट !!! " अम्मा चीखने लगी थी । यह मेरे अपनी तन्द्रा से भाग कर अम्मा के पास जाने का समय था । अम्मा हवा में हाथ पैर मार रही थी । "अब तू जो इस घर में आया, तो भगवान कसम कुल्हाड़ी से फाड़ देना है मैंने तुझे ।" मैं भाग के अम्मा के पास गया और इससे पहले के उनका हाथ चाक़ू पर पड़ता, मैंने घुमाकर एक जोरदार थप्पड़ उनके मारा । हकीम साहब ने यही नुस्खा बताया था, रामबाण । अम्मा झल्लाकर एकदम बेहोश हो जाती हैं । फिर एक पानी का छींटा मारते ही होश लौट आते हैं । छोटे से रस्सी के टुकड़े से मैं अम्मा को दूकान के एक खम्भे बाँध देता हूँ जहाँ पर छाँव आ रही है । और मैं फिर से टपरी के नीचे चला जाता हूँ । दामोदर भी मेरे साथ ही चला आया । बचपन से वैसे भी जहाँ मैं गया, दामोदर मेरे पीछे पीछे ही होता था । जो कमीज मुझे पसंद आई दामोदर को भी वही कमीज पसंद आएगी | जो भाजी मुझे पसंद है, दामोदर भी वही पसंद करेगा । भाग्य के खेल से हमारे बीच थोड़ी जो भी कटुता आई थी , वह सुनीता के सरल व्यवहार से धुल गयी । सब कुछ स्थिर हो गया था । सुनीता दामोदर के अम्मा, हमारी अम्मा दोनों से सहज  रूप से बातचीत करती थी ।  लेकिन फिर भी सुनीता के बाबा का व्यवहार मैं कभी भुला नहीं पाया । और सुनीता को भी नहीं ...


"अंकल , मटन का क्या रेट चल रहा है ।" लड़के पूछते हैं । बाहर नोटिस पर लिखा है, लेकिन मैं उनसे नहीं कहता , "अभी बच्चे हैं , खामखाँ  नाराज हो जायेंगे । छोटे आदमी को जबान भी छोटी ही रखनी चाहिए ।"
"एक सौ बीस ।"
"चल दो किलो लेके जाते हैं यार । कम पड़ जाएगा , पता नहीं कितने लोग आयेंगे साले । खाते भी तो राक्षसों की तरह हैं ।" पहला लड़का हँसा , दूसरे ने जिसे समवेत स्वर से नयी उचाइयां दी । 
लड़के दामोदर के ढाबे में फुल्कों का आर्डर  देकर यहाँ आये हैं । दामोदर के ढाबे में सुनीता उन लड़कों के खाने के लिए फुल्के सेंक रही है । अगर सुनीता का ब्याह मेरे साथ हुआ होता तो क्या इस तरह सुनीता को कष्ट होता । 
"अंकल , दो किलो । दो किलो तौल दो ।" क्या मैं कहीं खो गया था । क्या मैं सुनीता के बारे में कुछ ज्यादा ही सोचने लगा हूँ । "सुनीता ।" मैंने सुनीता को पुकारा , लेकिन सुनीता भागती चली गयी । मैं सुनीता के पीछे पीछे भागता हूँ । अचानक सुनीता एक दरवाजे के ओट में हो जाती है और जाने कहाँ से मुझे दिखाई देती है अम्मा, हाथ में कुल्हाड़ी लिए । मैं पसीना पसीना हो चुका हूँ । बिस्तर पूरा गीला हो गया है , लेकिन हलक जाने क्यों सूख गया । मैं अँधेरे में हाथ बढाकर लोटा लेता हूँ और पानी पीता हूँ । पीने से ज्यादा सीने पर गिराता हूँ , थोडा सुकून मिलता है । बाकी बची हुई रात करवटों में ही चली जाती है ।     

अगले रोज़ --
"अंकल, मटन का क्या रेट चल रहा है ?"
"दो सौ तीस रूपये ।"
"आधा किलो दे दो ।"
 साड़ी में छत से उलटी टंगी अम्मा से टुकड़ा टुकड़ा गोश्त मैं बेच रहा था ।